छपरा:- ‘’ममता” की छांव में संस्थागत प्रसव की राह हो रही है आसान, आधी रात में भी नहीं रूकती है कदम
• पहले सास कराती थी घरेलू प्रसव, अब बहू ने संस्थागत प्रसव का उठाया बीड़ा
• हर माह 80 से 90 महिलाओं का कराती है प्रसव
• रिविलगंज में सबकी ममता दीदी के नाम से मशहूर है संजोगिया देवी
छपरा। एक समय था जब संस्थागत प्रसव कि तुलना में गृह प्रसव की संख्या अधिक थी. जागरूकता के अभाव में लोग यह कदम उठाने को मजबूर होते थे। लेकिन समय के साथ हर कुछ बदलते चला गया। सरकारी अस्पताला में सुविधाएं बढ़ी एवं संसाधानों को सुगम बनाया गया। इसके साथ हीं लोगों मे जागरूकता भी आयी। इसके पीछे स्वास्थ्य कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन तो है ही. साथ में स्वास्थ्य विभाग में जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की भी भूमिका सबसे अहम रही है. इनके सहयोग से संस्थागत प्रसव की राह आसान हो रही है। हम बात कर रहे हैं सारण जिले के रिविलगंज प्रखंड के हाईस्कूल चौक निवासी संजोगिया देवी की। जो संस्थागत प्रसव की राह आसान करने के साथ संस्थागत प्रसव पर अलख जगाने का भी बीड़ा उठा रही है। संजोगिया देवी मूल रूप से ममता की कार्य करती है। लेकिन अपने कर्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा के साथ पालन करते हुए क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान कायम की है। संजोगिया देवी हर महिलाओं के “ममता दीदी” के नाम से जानी जाती है। खुद चुनौतियों से भरा जीवन गुजार रहीं है। लेकिन क्षेत्र के किसी भी घर में शिशुओं की किलकारी गुजंती है तो उन्हें याद जरूर किया जाता है। ठंड की रात हो, बारिश हो, धूप हो या छांव- जब लोग याद करते हैँ तो निस्वार्थ भाव से संजोगिया प्रसव पीड़ित महिला के पास पहुंच जाती है और तुरंत नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रिविलगंज में लेकर जाती है। ताकि संस्थागत प्रसव कराया जा सके। वह निरंतर 20 वर्षों से अपने कर्तव्य पथ पर चल रही है।
सास करती थी दाई का काम:
संजोगिया देवी कहती है वर्ष 2000-2001 के पहले अधिक महिलाओं का प्रसव घर पर ही होता था। यह काम उनकी सास करती थी। जागरूकता की कमी भी थी। इसलिए लोग घरेलू प्रसव कराते थे। लेकिन समय के साथ बदलाव होता है। उसी तरह अब यह तस्वीर बदल चुकी है। संजोगिया देवी बताती हैं- वह जब से यह कार्य कर रहीं है तब से लेकर आज तक हमेशा यह प्रयास रहता है कि महिला का प्रसव अस्पताल में ही कराया जाये ताकि जच्चा-बच्चा दोनों की जीवन सुरक्षित हो सके। घरेलू प्रसव कराना चुनौती और जोखिम से भरा होता है। अब यह बात गाँव के सभी लोगों को मालूम है.
कोरोना काल में भी अपने कर्तव्यों को बखूबी निभाया:
कोरोना की पहली और दूसरी लहर में जब हर कोई अपने-अपने घर में कैद था। उस दौर में कोई किसी के यहां आता- जाता नहीं था। उस समय भी जहां से उन्हें बुलावा आता था, वह बिना किसी झिझक के प्रसव पीड़ित महिला घर जाती थी और एंबुलेंस को बुलाकर अस्पताल लाकर सुरक्षित प्रसव के राह को आसान करने में अपना महत्वपूर्ण भूमिका का निवर्हन करती रहीं। कोरोना के उस दौर में वह खुद के सुरक्षा को लेकर भी सतर्क थी। यही कारण है कि अब मास्क और ग्लब्स का इस्तेमाल करना उनके आदतों में शुमार हो चुका है।
हर माह 80 से 90 महिलाओं का होता है प्रसव:
रिविलगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ममता संजोगिया देवी के सहयोग से हर माह 80 से 90 महिलाओं का संस्थागत प्रसव कराया जाता है। वह निस्वार्थ भाव से गर्भवती महिलाओं को अस्पताल लेकर पहुंचती है। ममता को प्रत्येक संस्थागत प्रसव पर 75 रूपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है। इसके साथ हीं संस्थागत प्रसव होने पर महिलाओं को भी सरकार के तरफ से प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है।
रात हो या दिन एक कॉल में आ जाती है घर:
रिलिवगंज के समसुदीनपुर गांव निवासी प्रभावती देवी कहती हैं गांव में अगर किसी भी घर के महिला का प्रसव होना होता है तो सबसे पहले ममता संजोगिया देवी को बुलाया जाता है और वह भी बिना किसी संकोच के रात हो या दिन एक कॉल पर चली आती है। उनकी बहू का तीन माह पहले प्रसव होना था, रात के करीब डेढ़ बज रहा था। तब संजोगिया देवी को कॉल किया गया और वह बिना देरी किये तुंरत पहुंची और अस्पताल लेकर गयी। जहां पर बेहतर सुविधा के साथ प्रसव हुआ।
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