धान खरीद: बोरे के हिसाब में उलझकर रह जा रहा किसान, प्रति बोरा जेब से जा रहे 60 ₹, लग सकती है 210 करोड़ की चपत
बोरा की दर तय करने में लागत की अनदेखी हुई, तो अब किसानों को 210 करोड़ की चपत लगेगी। यह आकलन गत वर्ष खरीद हुई लगभग 35.5 लाख टन धान की मात्रा के आधार पर है। अगर खरीद बढ़ी तो नुकसान और ज्यादा होगा। ऐसा धान खरीद में बोरे की जरूरत का सही आकलन नहीं करने के साथ सरकारी और बाजार दर में भारी अंतर के कारण होगा। किसानों को एक क्विंटल धान में बोरा की लागत 75 रुपये पड़ती है और खरीद एजेंसियां उन्हें देती हैं महज 15 रुपये। एजेंसियों को सरकार भी इसी हिसाब से पैसा देती है।
सरकारी रेट के अनुसार एक क्विंटल धान खरीद पर एजेंसी को बोरा के लिए 25 रुपये मिलना है। जबकि पुराने बोरे की कीमत बाजार में तीस रुपये प्रति बोरा है। एक बोरा में 40 किलों ही धान आता है। लिहाजा एक क्विंटल के लिए ढाई बोरा खरीदना पड़ता है। इस हिसाब से एक क्विंटल धान खरीद पर 75 रुपये का बोरा खरीदना पड़ता है। उसमें एजेन्सी को सरकार एक क्विंटल धान पर मात्र 15 रुपये देगी। दस रुपये प्रति क्विंटल उन्हें मिल मालिकों से लेना है। चावल मिलों की मनमानी इस कदर बढ़ गई है कि वह बोरे की कीमत के रूप में तय दस रुपया भी नहीं देते हैं। ऐसे में यह सरा बोझ एजेंसियां किसानों पर ही डाल देती हैं। लिहाजा किसानों का हाल इस कहावत सरीखा हो गया है कि ‘गुड़ का नफा चींटी ही खा जाती है’।
बाजार में नहीं मिल रहा पुराना बोरा
खास बात यह है कि बाजार में पुराना बोरा मिल नहीं रहा है। खरीद एजेंसियां किसानों को बोरा देती नहीं हैं। वह कहती हैं कि बोरा किसान खुद खरीद लें और सरकार जो पैसा देती है उसका भुगतान उन्हें कर दिया जाएगा। अब जिन किसानों का धान तैयार हो गया है वह बाजार में बोरा के लिए भटक रहे हैं। कई जगह तो किसानों को एक बोरे के लिए 40 रुपये तक देने पड़ रहे हैं। बोरे की किल्लत कोई नई बात नहीं है। लेकिन हर साल इसकी परेशानी धान कुटाई के बाद चावल देने के समय होती है। लिहाजा यह परेशानी एजेंसियां और मिलर को उठानी पड़ती है। इस बार अभी से बाजार में बोरा नहीं मिलने से परेशानी किसानों को झेलनी पड़ रही है।
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